जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-छग की सांस्कृतिक विरासत (देवार गीत)
विधा-आलेख
देवार छत्तीसगढ़ की एक घुमन्तु जनजाति है जो यहाँ कि जनप्रिय लोककथाओं और लोकगीतों का गायन कर अपनी आजीविका कमाते रहे ।यह जाति अब छत्तीसगढ़ के विभिन्न नगरों के तालाबों,नदियों या खुले मैदानों में अपने डेरे तानकर रहने लगी है ।
देवार अपना संबंध छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास से जोड़ते हैं ।वे मध्यकालीन छत्तीसगढ़ी राज दरबारों में गायक कलाकार के रुप में उनका मनोरंजन किया करते थे ।किंतु 19वीं सदी में आये भीषण अकाल ने उन्हें भटकने को मजबूर कर दिया ।
रतनपुर में अब भी इक्के- दुक्के देवार परिवार बसते हैं ।
अपनी आजीविका के लिए सांप या बंदर का खेल दिखाते हैं ।सुअर पालन इनका मुख्य व्यवसाय हो गया है ।कुछ बुजुर्ग देवार सारंगीनुमा वाद्य रुंझु बजाकर भीख मांग लेते हैं,जिन्हें "जोगी देवार" कहा जाता है ।
देवार स्त्रियाँ विवाह या मांगलिक अवसर पर लोगों के घरों पर या गलियों में नांचती थी पर अब मंचों पर लोकगायन या नृत्य प्रस्तुत करने लगी हैं ।
इस जाति में संगीत के प्रति विशेष लगाव देखा गया है ।छत्तीसगढ़ की वाचिक परम्परा को इस समुदाय ने सदियों से अब तक जीवित रखा है ।इस समुदाय की महिलाओं की गायन की निपुणता को सबसे पहले रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना ।उन्होनें अपनी रंगमंडली में महिलाओं को स्थान दिया।इससे देवार समुदाय के लिए संभावनाओं के द्वार खुल गये ।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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