Wednesday, January 6, 2021

कांकेर से नलिनी बाजपेयी की रचना- समंदर का किनारा

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
     संबलपुर,जिला-कांकेर,(छ.ग.)
         विषय-समंदर का किनारा
               दिनाँक -06.01.21
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       *समंदर का किनारा*

समंदर का किनारा, 
मुझे भाता बहुत है,
चढ़ते-उतरते ज्वार भाटा 
देखना भाता बहुत है।

सागर के किनारे 
रेत का महल बनाना,
लहरों द्वारा महल को बहा 
ले जाना भाता बहुत है।

अथाह समंदर इतना 
खारापन जाने कहाँ से लाया,
लहरों संग सीप,मोती,कीमती 
रत्नों को बाहर लाना भाता बहुत है।

कभी नीला,हरा समंदर के 
अंदर से रवि को निकलते देखा,
साँझ ढले सूरज को समाते और 
चाँद को तैरते देखना भाता बहुत है।

दूर से दहाड़ता,लहरों में 
तूफानों को समेटता,
लहरें मेरे पैर की मिट्टी को 
हटाता यह देखना भाता बहुत है।

     नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)

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