निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
विषय:-""मल्लाह ""
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक--""मल्लाह "" ।
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••~~~~<||•मल्लाह •||>~~~~••
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तुझे मल्लाह कहूँ या---
नाविक या खेवनहार ,
जब मंझधार में बसे जिन्दगी,
आप ही लगाते,नैय्या पार--।
मल्लाह बने जब प्रभु --
जीवन की नैय्या हो जाती पार ।
झील हो या बड़ी नदिया--
या बाढ़ में फंसा मुसिबती,
सबको जरूरत होती है,
एक हुनरमंद मल्लाह की,
जो पहुँचा सके,मंजिल तक--।
वस्कोडिगामा हो या सिंदबाद जहाजी,
समन्दर की तूफानी लहरों को,
पार किया अपने हौंसलों से,
पाई अपनी वो मंजिल --।
कोलंबस मल्लाह व जहाजी,
समुद्री मार्ग से ढूँढने निकले,
भटक गए और पहुँचे कहीं और--
पर खुशियाँ हुई अपार,
नई जगह खोजकर हो गये नामी--।
मल्लाह तेरी जोखिम भरी जिन्दगानी,
सागर की लहरों से रोज हैं खेलते,
परिवार का पेट भरने की जुगत में ,
अपनी जान भी कभी खो देते--।
मल्लाह की बस्ती से निकले--
देश का हीरा -पुत्र जन्मा,
आगे चलकर बन गया वो,
देश का राष्ट्रपति,नाम था उनका,
डाँ ए.पी.जे.कलाम --।
मल्लाह तेरी है--
अजीब सी कहानी,
भोर होते,निकल पड़ते सागर में,
मछलियाँ पकड़ने,जीविका के लिए ।
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व्याख्या:--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मल्लाह की ज़िन्दगी होती है दर्दभरी कहानी ।
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