Friday, January 29, 2021

नलिनी बाजपेयी कृत आलेख- भूख

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ. ग.) 
  दिनाँक-29.01.21
              *भूख*
      भूख संसार की बहुत बड़ी जरूरत है। संसार के सारे गोरखधंधे पेट की आग बुझाने के लिए होता है। भूख दो प्रकार का होता है।1. शारीरिक भूख 2. मानसिक भूख ।शारीरिक भूख अर्थात पेट की भूख.....खाने की इच्छा ।जब मनुष्य क्षीणता का अनुभव करता है ।शरीर के अंग सुचारू रूप से काम नहीं करता, तब उसे भोजन की आवश्यकता होती है ।किसी भी भूख का शाब्दिक अर्थ-" *आवश्यकता*  
           हालांकि व्रत ,उपवास में व्यक्ति कई दिनों तक भूखा रहता है। वह एक साधना है... वह एक तपस्या है ।पेट के भूख के अलावा संसार में और भी भूख होते हैं। कुछ  लोगों को प्रतिष्ठा की भूख, संपत्ति की भूख ,आत्म संतुष्टि की भूख होती है।यह भूख व्यक्ति के जज्बा के ऊपर निर्भर करता है। व्यक्ति के अंदर कुछ पाने की ,कुछ बनने की या यश प्राप्ति , धन प्राप्ति की भूख होती है।उसके लिए उसे कठोर कर्म करना पड़ता है,तब वह कोई नामधारी वाली डिग्री प्राप्त करता है।किसी उच्च शिखर में पहुँच जाता है।देश-विदेश में उसकी ख्याति फैलती है।बहरहाल कोई भी भूख हो उसके लिए सतत कर्म, सतत साधना की आवश्यकता होती है।
        पेट की भूख तो स्वाभाविक है।जीव जन्तु,जानवर,मनुष्य, सब अपने पेट की भूख तो शांत कर ही लेते है,मगर मनुष्य में कुछ बनने,कुछ पाने की भूख ही उसके लिए उपलब्धियों के द्वार खोलता है।ऐसी भूख मनुष्य में अवश्य होना चाहिए।

ज्ञान की भूख मन में भरता है विश्वास,
ना होती उसे भूख दौलत की,बस कुछ पाने की आस।
पेट की भूख जीवन भर रोते और 
गम ढ़ोते,
सपनों की ,उपलब्धियों की दुनियाँ से बहुत दूर है होते।

       नलिनी बाजपेयी
   संबलपुर, कांकेर, (छ.ग.)

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