स्थान- दुर्ग ( छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक-
*प्यासा साहिल*
सहेजे हुये समेटे हुये अथाह सागर अपने में,
मचलती लहरें यूं लुभाती जैसे
अप्सरा आती हो सपने में,
मजबूती से सहता है हर चोट
आते रहते कितने जलजले
कितने तूफान कितने उफान
टकराती लहरें करती हैरान,
छूकर उमंग से भर देती है
पर लहरें कहाँ ठहरती हैं,
मिटती नहीं पल भर में
यह तृष्णा मिलन की
भिगोकर तन,अतृप्त कर मन
चली जाती लहरें मनचली,
मिट्टी गीली, पर प्यास अधूरी
खेलती जैसे आँखमिचौली
सौंदर्य बढ़ाती सूर्योदय तो
सूर्यास्त चार चाँद लगाती,
बच्चों का शोर, लगे चौपाटी
ठंडी पवन भी लगे सुहानी
सागर किनारे सुंदर नजारे
बिकते देखें गोलगप्पे गुब्बारे
जाने कितने चोट खाकर भी
सबके दिल को यह बहलाये ।।
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