जिला - बलौदाबाजार
विषय - समंदर का किनारा
विधा - छंद मुक्त कविता
शीर्षक - संसार है समंदर
*************************
// संसार है समंदर //
संसार है समंदर ,
बैठे रहो किनारे ।
लहरों का तमाशा ,
देखते रहो नजारे ।।
सागर का सौंदर्य ,
तटवर्ती आँचल ।
लहरों का नर्तन ,
चंचल और चपल ।।
भयानक जलचर ,
भँवर और सुनामी ।
सागर बड़े विशाल ,
अगाध जल राशि ।।
ऐसे ही संसार सिंधु ,
लगते मनभावन ।
राग द्वेष स्वार्थ की ,
लहरों का घर्षण ।।
सुख - दुःख के भँवर ,
संघर्ष और टकराव ।
सौ - सौ जूते खाएँगे ,
जो करते खूब लगाव ।।
संसार से तटस्थ हो ,
करे कर्तव्य व्यवहार ।
प्रभु की गोद बैठा ,
उनका ही बेड़ापार ।।
संसार का किनारा ,
भगवान की भक्ति ।
मोह माया ममता से ,
बचने की युक्ति ।।
संसार की सुंदरता ,
मानो विष कन्या ।
प्रभु के भरोसे ,
सौंप दो जीवन - नैया ।।
संसार की मजदूरी ,
नश्वरता की चाह ।
बैल - गधा से मानव ,
क्यों है बेपरवाह ??
संसार और समंदर ,
दूर के ढोल सुहावने ।
ले लो मजा किनारे से ,
यही चतुराई सयाने ।।
---#---#---#---
No comments:
Post a Comment