Wednesday, January 6, 2021

बलौदाबाजार से लीलाधर कुम्हार की रचना- समंदर का किनारा

रचनाकार - लीलाधर कुम्हार
जिला - बलौदाबाजार
विषय - समंदर का किनारा
विधा - छंद मुक्त कविता
शीर्षक - संसार है समंदर
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      // संसार है समंदर //

संसार है समंदर ,
बैठे रहो किनारे ।
लहरों का तमाशा ,
देखते रहो नजारे ।।

सागर का सौंदर्य ,
तटवर्ती आँचल ।
लहरों का नर्तन ,
चंचल और चपल ।।

भयानक जलचर ,
भँवर और सुनामी ।
सागर बड़े विशाल ,
अगाध जल राशि ।।

ऐसे ही संसार सिंधु ,
लगते मनभावन ।
राग द्वेष स्वार्थ की ,
लहरों का घर्षण ।।

सुख - दुःख के भँवर ,
संघर्ष और टकराव ।
सौ - सौ जूते खाएँगे ,
जो करते खूब लगाव ।।

संसार से तटस्थ हो ,
करे कर्तव्य व्यवहार ।
प्रभु की गोद बैठा ,
उनका ही बेड़ापार ।।

संसार का किनारा ,
भगवान की भक्ति ।
मोह माया ममता से ,
बचने की युक्ति ।।

संसार की सुंदरता ,
मानो विष कन्या ।
प्रभु के भरोसे ,
सौंप दो जीवन - नैया ।।

संसार की मजदूरी ,
नश्वरता की चाह ।
बैल - गधा से मानव ,
क्यों है बेपरवाह ??

संसार और समंदर ,
दूर के ढोल सुहावने ।
ले लो मजा किनारे से ,
यही चतुराई सयाने ।।

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