राजनांदगांव छत्तीसगढ़
विषय छेरछेरा
विधा लघु कथा
*अन्नदान*
बहुत समय की बात है धरती पर घोर अकाल पड़ गया। लोग चारों तरफ हाहाकार मचाने लगे। खाने के लिए अन्न नहीं, पीने के लिए जल नहीं ।धरती माता वीरान सी हो गई थी। लोग भूखे मरने लगे थे तभी लोगों ने सोचा आखिर इतनी तकलीफ और समस्याएंँ क्यों आ रही है? ऐसा क्या हुआ ? जो प्रकृति हम पर कहर ढा रही है। सभी एक दूसरे के साथ चिंतन विचार कर प्रकृति को मनाने के लिए उनकी पूजा पाठ करने लगे विधि विधान से पूजा पाठ किए तभी धरती माता प्रकट हुई और कहने लगी हे! मेरे धरा के संतानों तुम लोग जब तक आपस में प्रेम भावना से नहीं रहोगे एक दूसरे का सम्मान नहीं करोगे तब तक हमेशा दरिद्रता और अकाल संसार में होता रहेगा।
अतः आज से सभी यह प्रण ले लो कि एक दूसरे का सम्मान करोगे। जो ज्यादा धनवान है वह दूसरे को अपने से छोटे को दान दे और जो गरीब है वह भी शक्ति अनुसार दूसरों को दान दें। इससे आपस में प्रेम भावना बढ़ेगा और खुशहाली आएगी इस तरह कहकर देवी मांँ अपने धरा के संतानों को एक सीख दे गई। उसी दिन से लोग चाहे अमीर हो या गरीब हो सबके घर अन्न मांँगने जाते हैं और सभी लोग एक - एक मुट्ठी अन्न का दान करते हैं। यही है अन्नदान महादान और यह पावन दिन आता है हमारे छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध त्यौहार पूस पूर्णिमा को छेरछेरा पर्व । इस दिन को अन्न दान के रूप में जाना जाता है।
पद्मा साहू "पर्वणी"
खैरागढ़ छत्तीसगढ़
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