स्थान ---नवापारा खुर्द/ सक्ति
जिला---- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा---आलेख
विषय---छेरछेरा
शीर्षक---आगे छेरछेरा
छत्तीसगढ़ में अनेक त्योहार मनाये जाते हैं, उनमें से एक छेरछेरा का त्योहार है ।यह त्योहार पौष पूर्णिमा को मनाया जाता है ।छेरछेरा पर्व को शाकंभरी पर्व के नाम से भी जाना जाता है ।यह पर्व खरीफ की फसल को घर में लाने के बाद मनाया जाता है इस त्योहार को मनाने के पीछे की कथाएं हैं उनमें से एक कथा के अनुसार-
पार्वती से विवाह पूर्व भगवान भोलेनाथ ने पार्वती की की परीक्षाएं ली थी उनमें एक परीक्षा यह भी थी वे नट बनकर नाचते गाते पार्वती के निवास पर भीख मांगने गए थे और स्वयं ही शिव की निंदा करने लगे थे ताकि पार्वती विवाह करने से इन्कार कर दे लेकिन इस परीक्षा में पार्वती सफल हो गई और भगवान भोलेनाथ के साथ उनका विवाह होना तय हो गया ।
दूसरी कथा के अनुसार किसान के द्वारा अनाज का उत्पादन किया जाता है और सुरक्षित रखने के लिए कोठी में भरी जाती है। इसमें मजदूरों का सहयोग रहता है जिन्हें मजदूरी के अलावा कुछ नहीं मिलता । इससे उनको दुख होता है उनके निवारण के लिए कुछ किसानों के द्वारा मां धरती की तपस्या किया गया और धरती माता प्रकट होकर बोली ।
सभी किसान गरीब मजदूरों को यथा योग्य दान कीजिए अन्यथा तीन वर्षों तक आकार का तुम सबको दुख झेलना पड़ेगा इसे सुनकर सभी डर गए और उसी दिन से यह रिवाज प्रारंभ हुआ तबसे यह मनाया जा रहा है ।
गांवों में इस त्योहार को खूब मनाया जाता है ।बच्चे,जवान बूढ़े महिलाएं सभी मांगने के लिए घर घर घूमती है और उनको अन्य भिक्षा के रूप में प्राप्त होता है एक प्रचलित वाक्य कहते हुए घर घर में जाते हैं।
छेरछेरा भी छेरछेरा।
कोठी के धान हेरहेरा ।
जब तक ले मिलही नहीं ।
ए मेरे ले झन टरा ।
मांगने के लिए सब समूहों में रहते हैं,लोग दान करके खुशियां मनाते हैं ।
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