Wednesday, January 27, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- संवादिका

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, जिला;कांकेर,( छ. ग.)
विषय-संवादिका,दिनाँक-27.01.21
              *संवादिका*

अनुशासन का पाठ पढ़ाती,
         संवादिका हूँ कहलाती,
धरती का क्षुद्र जीव कहलाती,
         चलती अनवरत जाती।

अपने वजन से
       ज्यादा बोझ उठाती,
त्याग संयम श्रम का
       निरन्तर पर्याय बताती।

पल-पल आगे बढ़ती जाती,
       दुर्गम मंजिल तक चढ़ जाती,
मेरे प्रयासों का मानव द्वारा 
      हर बार उदाहरण दी हूँ जाती।

कभी कुचली जाऊँ कभी 
          गजराज को रूला जाती,
दीवारों पर चढ़ती,गिरती सौ
         बार हूँ फिसलती जाती।

तन्मय हो विचरण करती,
         धरती में राज हूँ करती,
श्रमजीवी हूँ कहलाती,
       अनुशासन का पाठ पढ़ाती।
_______________________

       नलिनी बाजपेयी
  संबलपुर, कांकेर, (छ.ग.)

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