जिला :- महासमुंद
विषय :- संवादिका
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- संवादिका
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कुछ दिन का ही मिलता जीवन,
सार्थक उसे बनाती है।
नन्ही सी होती संवादिका पर,
कर्म बड़ा कर जाती है।
कर्म की साधक, कर्म से अपने,
निज पहचान बनाती है।
नामुमकिन जो काज दिखे तो,
मुमकिन कर दिखालाती है।
संतोषी है सखा संवादिका,
सुखी सदा ही रहती है।
अविरल वह नद की धारा सी,
कर्म पथ पर बहती है।
नेह भाव उर में वह रखती,
परहित को तत्पर रहती है।
एक - दूजे का साथ ना छोड़े,
संग सदा ही रहती है।
कुछ दिन का ही मिलता जीवन,
सार्थक उसे बनाती है।
नन्ही सी होती संवादिका पर,
कर्म बड़ा कर जाती है।
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