संबलपुर,जिला-कांकेर,( छ. ग.)
विषय-मल्लाह
दिनाँक-15.01.21
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*मल्लाह*
मेरा जीवन पार लगाने वाले
अमर अविनाशी मल्लाह,
तुमसे जुड़ी रहती बिन डोरी
के मुँह से निकले ना आह।
बीच मंझधार में प्रभू
तुम आते हो बन पतवार,
कैसे कहीं और देखूँ,
तुम बिन दिखता ना आधार।
जीवन को देने वाले कैसे
बताऊँ तुम ही खेवनहार,माँझी,
नाविक,मल्लाह क्या नाम दूँ
तुम ही पालनहार।
जीवन की ऊँची-नीची डगर
में हाथ थामते हर बार,
तुम ही आदि और अंत,
तुम बिन सूना है संसार।
भवसागर में पड़ा राग-द्वेष,
माया,मोह से भरा कर दो उपकार,
भव की लहरों में डूबता उतराता हूँ ,
तब नौका लगाते पार।
तुम्हारा ऋण कैसे उतारूँ
ओ मेरे तारणहार,
तुम बिन चल ना सकूँगा
तुम्हीं संभालों मेरे करतार।
निशदिन वन्दन करुँ,
अर्चन है बारम्बार,
मुझे मत बिसराना प्रभू
तुम बिन मैं निराधार।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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