जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-पगडंडी
विधा -कविता (मुक्त छंद)
बचपन में पगडंडी से
पैदल मेला में जाना।
रास्ते खेत-खलिहानों में
पीले सरसों,नीले अलसी
और सफेद- कत्थई मटर
लहलहाते उन फूलों को
बस एक टक निहारना।
सुंदर हरितिमा का चादर
ओढ़े पहाड़ी को पास से
निहारना और खुश होना
खेत के पानी में मछली
मेढ़क और झींगे को देख
उछलना और शोर मचाना।
आज याद आता है वो मासूम
बचपन और वो पतला पगडंडी ।
मैं बड़ी हुई और पगडंडी सड़क
बन गया और खो गया वो मंजर
जिसे पगडंडी में निहारे थे कभी,
विलुप्त हो गई है वो पगड़ंड़ियां,
गांव के अचानक शहर बनने से।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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