Monday, January 4, 2021

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- पगडंडी

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
     विधा - मुक्त कविता 
   शीर्षक - " पगडंडी "
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गाँव की ओ पगडंडी जो, 
जाती थी जंगल की ओर। 
शांति बसती थी जहाँ, 
होता नहीं था कोई शोर।। 

काँटों, पथरीली भरी पतली डगर थी। 
मंजिलों की न कोई खबर थी। 
मदमस्त थे हम उस दुनिया में, 
ये गाँव था मेरा, न कोई शहर थी।। 

पैदल चलकर हम समूह में,
रास्ते तय किया करते थे। 
अकेले नहीं तब सब हम, 
हाथ थामा साथ चलते थे।। 

बारिश से भीगी जब पगडंडी, 
कीचड़ हो जाती थी। 
चलना होता बहुत मुश्किल, 
पैर फीसल जाती थी।। 

घास में छिपी संकरी पगडंडी,
खेतों की याद आती है। 
माँ-बाबू करते थे खूब मेहनत, 
फसलें गीत गाती थी।। 

किसान पगडंडी का मुसाफिर है। 
हर हाल में उसको चलना है। 
पसीने से लथपथ रहता जो, 
कभी गिरना तो कभी सम्हलना है।। 

टेढ़ी-मेढ़ी थी भले ही राह, 
पर जीवन बहुत सरल था।
कच्ची मकानें,पर मजबूत इरादे, 
वही मेरा सपनों का महल था।।

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मौलिक रचना ( स्वरचित ) 
संतराम कुम्हार 
बलौदाबाजार (छ.ग.)

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