निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-,रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-""पगडंडी ""।
!!!!!!$$$$$$$$$$$!!!!!!!!••••••••
•••••••○||पगडंडी ||○••••••
•••••••••••••
आदिकाल मानव का जीवन--
सघन वन में होता था,
फिर गाँव,शहर,कस्बों व राज्य,
आवागमन की सुविधा का था अभाव।
सघन वन,दुर्गम पथ थे---
चलते-चलते पग से,
बन जाती है पगडंडी,
और जब चलते उस पर लोग,
बन जाती हैं स्थायी राह--।
आज भी सुदूर अंचल गाँवों में--
सड़क,पथ नहीं होते ठीक,
चलना पड़ता उनको मजबूरन पगडंडी
पहाड़ी लोगों का जीवन--
ही पगडंडियों से है गुजरता,
सवारी बनते ,घोड़े,खच्चर व याक ।
पगडंडी में,होते हैं मोड़---
पक्की सड़क होती हैं घुमावदार,
पर पगडंडी होतीं हैं सीधी,
गाँव-कस्बों को,जोड़ देती--
अक्सर ये ही पगडंडी--।
पगडंडी उबड़-खाबड़--
व धूल-धुसरित या पथरीली,
राहों की होती हैं,
देहातीयों,बंजारों की राहें,
आसान करती हैं ये पगडंडी--।
याद रखों तुम,सडकों का वजूद,
होतीं हैं,ये पगडंडियाँ,
मुसाफिर को,दिशा सुझाती,
है ये बेजान पगडंडी--।
!!!!!!!!!!!!!$$$$$$$$$$!!!!!!!!!°°°°
व्याख्या-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मानव सभ्यता की सहायक होती हैं पगडंडी ।यही सडकों का वजूद है बनती ।
●●●●●○○○○○●●●
No comments:
Post a Comment