स्थान- दुर्ग ( छ.ग.)
विधा- कविता
विषय- बसंत
शीर्षक-
*देख सखी बसंत आया*
देख सखी बसंत आया,मन मेरा हर्षाया
मोहक बसंत आने की जैसे, प्रकृति करने लगी घोषणा
वृक्षों की डाली पर बैठी, कोयल कुहू-कुहू गाती गाना,
देख सखी बसंत आया,मन मेरा हर्षाया ।
सुगंधित पुष्प हुए पल्लवित, भौंरा देख ललचाया,
आम के बौर लगे महकने, महुओं से लदी हर शाखा
फसल पकने से प्रफुल्लित कृषक,मौसम खुशियों का आया,
देख सखी बसंत आया, मन मेरा हर्षाया ।
खिली-खिली कुसुम सरसों की,सूर्य किरणों ने है सौंदर्य बढ़ाया,
पीत रंग का वसन जैसे खेतों को पहनाया,
बाग-बाग हर कली-कली मँडराती देखो तितलियाँ,
देख सखी बसंत आया ,मन मेरा हर्षाया ।
मंद पवन की चली बयार,सरोवर में पंकज का बना बिछौना,
हर धर्म का उत्सव हो जैसे मन की पावन भावना,
पक्षी-पक्षी करते कलरव,गुंजित गगन मुस्काया,
देख सखी बसंत आया,मन मेरा हर्षाया ।।
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