Tuesday, December 8, 2020

जांजगीर-चांपा से गिरधारी लाल चौहान की रचना- विवाह

नाम---गिरधारी लाल चौहान
स्थान--नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला-जांजगीर-चाम्पा/छत्तीसगढ़
विधा-कविता
विषय-विवाह
शीर्षक-विवाह

सोलह संस्कारों में एक , विवाह संस्कार ।
नारी और पुरुष सबको,  है यह स्वीकार ।

पहले बाल विवाह था प्रचलित ।
आज की स्थिति में नहीं है उचित ।
लगभग बंद हुआ आज यह रीत ।
आज के युवा इसे दिये नकार ।

पहले माता पिता पसन्द करते थे ।
और विवाह  तय हो जाता था ।
अब लड़की लड़का  पसंद करते हैं ।
तब रिश्तों का जुड़ता है तार ।

विवाह में दहेज प्रथा है जारी ।
पुरुष का इसमें  है चांदी चांदी।
  मौत के मुंह में जा रही  नारी ।
यह है इसका बहुत अत्याचार ।

विवाह एक ही जाति में होते ।
अंतर्जातीय भी चलन में है ।
प्रेम विवाह भी हो रहे हैं ।
नवयुवक युवती का है विचार ।

वैवाहिक जीवन कुछ कहते वाह ।
कुछ आंसू बहा रहे कह रहे आह ।
सब की अपनी है धारणा यारों ।
विवाह से बनते हैं जहां में परिवार ।

विवाह का बंधन दो आत्माओं का मिलन ।
एक बार बंध जाए  रहना चाहिए आजीवन ।
टूटते बिखरते परिवार से बचना चाहिए ।
विवाह की राहों में सबको चलना चाहिए ।

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