स्थान--नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला-जांजगीर-चाम्पा/छत्तीसगढ़
विधा-कविता
विषय-विवाह
शीर्षक-विवाह
सोलह संस्कारों में एक , विवाह संस्कार ।
नारी और पुरुष सबको, है यह स्वीकार ।
पहले बाल विवाह था प्रचलित ।
आज की स्थिति में नहीं है उचित ।
लगभग बंद हुआ आज यह रीत ।
आज के युवा इसे दिये नकार ।
पहले माता पिता पसन्द करते थे ।
और विवाह तय हो जाता था ।
अब लड़की लड़का पसंद करते हैं ।
तब रिश्तों का जुड़ता है तार ।
विवाह में दहेज प्रथा है जारी ।
पुरुष का इसमें है चांदी चांदी।
मौत के मुंह में जा रही नारी ।
यह है इसका बहुत अत्याचार ।
विवाह एक ही जाति में होते ।
अंतर्जातीय भी चलन में है ।
प्रेम विवाह भी हो रहे हैं ।
नवयुवक युवती का है विचार ।
वैवाहिक जीवन कुछ कहते वाह ।
कुछ आंसू बहा रहे कह रहे आह ।
सब की अपनी है धारणा यारों ।
विवाह से बनते हैं जहां में परिवार ।
विवाह का बंधन दो आत्माओं का मिलन ।
एक बार बंध जाए रहना चाहिए आजीवन ।
टूटते बिखरते परिवार से बचना चाहिए ।
विवाह की राहों में सबको चलना चाहिए ।
No comments:
Post a Comment