जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - कविता
शीर्षक - " बेटी का विवाह "
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बेटी सयानी हो गई,
शादी की चिंता सताती है।
लोगों के बातों को सुनकर,
रातों को नींद नहीं आती है।।
उम्र के बाद बेटी को क्यों,
बोझ समझी जाती है।
जितनी जल्दी विवाह हो जाये,
ऐसी धारणा क्यों बन जाती है।।
सांवली का कोई मोल नहीं,
गोरी ही प्राथमिकता पाती है।
चरित्र की कोई कदर नहीं,
रंग रुप हावी हो जाती है।।
मिल जाता कोई लड़का भी तो,
जमीन भी कम पड़ जाती है।
दहेज की माँग को पूरा करने,
माँ, गहना भी गिरवी रख आती है।।
बेटी की अरमानों को पूरा करने,
माँ-बाप हर प्रयास लगाती है।
शादी की डोली में उसको बिठाकर,
अपना हर फर्ज निभाती है।।
जीवनभर की कमाई को जोड़कर,
विवाह संपन्न कराती है।
फिर क्यों किसी की बेटी,
आग में झुलसी जाती है।।
बड़े नाजों से जिसको पाला,
पापा की जो परी कहलाती है।
छोड़ अपने पिता की दुनिया,
पति का क्यों हो जाती है।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
Bahut sundar bhai sant
ReplyDeleteThank-you bhai
DeleteBilkul sach hai...
ReplyDeleteBahut badhiya bhaiya
ReplyDeleteThank-you
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