जिला :- महासमुंद
विषय :- क्या होती है कविता?
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- कविता
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पूछे कोई गर मुझसे आकर,
कहो जरा कि क्या है कविता?
मैं बोलुंगा कविता होती,
मनु भावों की बहती सरिता।
अलंकरण है शब्दों की और,
तरु की शीतल छांव कविता।
मंजिल को नित बढ़ती जाती,
ना थकने वाली पांव कविता।
तेज परिंदों सी उड़ती है,
कल्पनाओं की उड़ान कविता।
उर में उठती उन्मादों की,
अनुपम है पहचान कविता।
सच कहने का माद्दा रखती,
सिंहों सी है निडर कविता।
सीमाओं में बंधी नहीं है,
जाती चाहे जिधर कविता।
कविता में रस - छंद है,
ईश्वर का उपहार कविता।
लिखती है पतझड़ जीवन की,
संग ही लिखती बहार कविता।
सुर की सागर, भाव की गागर,
कटुता संग है भरी नम्रता।
प्रीत - गीत - संगीत लिए वह,
आदिकाल की रीत कविता।
कविता में हंसमुख नजारे,
क्रूरता - क्रंदन लिए कविता।
कविता में माटी की महक है,
निज संग चंदन लिए कविता।
क्रोध भाव की ज्वाला है,
मैया का वात्सल्य कविता।
लिए रस वीभत्स भाव की,
शोक लहर की धार कविता।
बड़े जतन से बनती है तब,
छूती उर की तार कविता।
शोषित को अधिकार दिलाने,
कविवर का हथियार कविता।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने कविता को कविता के माध्यम से चित्रित करने का प्रयास किया है।
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