जिला :- महासमुंद
विषय :- विवाह
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- कोरोना विवाह
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आज विदा करते बेटी को,
बाबुल के आंखों में सुकून की चमक थी,
रो तो रहा था दूर होने से,
मगर कर्जमुक्त विवाह से दिल में चहक थी।
कितने ही वर्षों से चिंतित था,
आएगी बारात तो क्या खिलाएगा।
ना खुश हुए बाराती तब,
कैसे भला बेटी दामाद को मुंह दिखाएगा।
चिंता थी दहेज की,
ना देना पड़े दहेज, तो उपहार ही देना होगा,
जाने कौन सी टी.वी. ,
कौन सी वाली गाड़ी देना होगा।
संका इस बात की भी,
कि कौन से क्वालिटी के कार्ड छपवांएगे।
ना आए भले मेहमान सभी,
पर निमंत्रण तो सबको भिजवाएंगे।
आएंगे मेहमान तो,
पकवान भी बनवाने होंगे,
एकाध से ना माने ये समाज,
कितने ही बकरे कटवाने होंगे।
दुल्हे घर वालों की अपनी अलग,
रईसी की नुमाइशे होंगी,
स्टेज डेकोरेशन की,
अलग ही फरमाइशें होंगी।
मगर चलो अच्छा ही हुआ,
दुनिया में छाई कोरोना,
वर्षों से मांगी जो दुआ,
प्रभु के आर्शीवाद बन आया ना।
ना कार्ड का कोई ताम झाम,
ना आए ज्यादा मेहमान,
हजारों में ही निपट गया,
लाखों के विवाह का काम,
ना पकवान बना,
ना बकरा कटवाए,
ना ज्यादा बाराती आए,
ना डेकोरेशन करवाए।
दबाव में दहेज के,
ना लेना पड़ा कर्ज,
सादा, सिम्पल, सुंदरता से,
निभाया हमने फर्ज।
अब तो एक ही आस है,
छोटी की शादी में कोरोना फिर गड़ाए निगाह,
ऐसे ही चिंता मुक्त हो जाए,
छोटी का भी विवाह,
कोरोना विवाह।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने कोरोनाकाल का शादी पर हुए प्रभाव को व्यक्त करते हुए कहा है कि कोरोना महामारी के कारण शादी में दिखावा और फिजूल खर्च को कम कर दिया है। साथ ही कवि यह कामना करते हैं कि काश हमेशा के लिए यहीं रीत चलती रहे जिससे की पालकों में बच्चों की शादी की अतिरिक्त चिंता कम हो।
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