Saturday, December 19, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- भूमि

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
     विधा - मुक्त कविता 
   शीर्षक - " भूमि "
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खून पसीने से सींची मैंने,
यह मेरी ही भूमि है।
अपने भाग्य बोता जहाँ, 
मेरी ही यह कर्मभूमि है।। 

मिट्टी की सौंधी खुशबू से, 
बहुत पुराना मेरा नाता है। 
भूमि में पला भूमि में हुआ बड़ा, 
यही मेरा भाग्यविधाता है।। 

अन्न उगाता भूमि पर मैं, 
कठिन परिश्रम करता हूँ। 
साँसे जुड़ी है इनसे मेरी, 
जीवनदायिनी मैं कहता हूँ।। 

मैं धरा का पुत्र, 
धरती मेरी माता है। 
मेरी आत्मा अंतिम घड़ी में,
तुझपे ही शरण पाता है।। 

हे! जन्मभूमि हे! कर्मभूमि, 
तेरा कर्ज कैसे उतारुँगा। 
हर जन्म में तेरी सेवा करुँ,
मैं हरदम यही चाहूँगा।। 

देख तेरे सेवक ही हालत,
अब क्या हो गई है। 
किसान खेती-किसानी छोड़, 
रोड पे आ गई है।। 

भूमि के ठेकेदार तो, 
तेरा भी सौदा करने वाले हैं। 
अपने मुनाफे के ख़ातिर,
किसान का हक भी खाने वाले हैं।। 
            
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मौलिक रचना ( स्वरचित ) 
संतराम कुम्हार 
बलौदाबाजार (छ.ग.)

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