जिला :- महासमुंद
विषय :- भूमि
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- भुईयाँ के पीरा
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का बताओं संगी भुईयाँ के पीरा,
धूँ - धूँ करके जरत हे पलारी।
हरियर सुघ्घर दाई के अँचरा,
हो गय हे जी कारी - कारी।
अपन स्वार्थ बर कछु भी करथे,
भुलाके भुईयाँ के उपकार।
माई जहां देथे अन्न - पानी,
मनवा फिरोथे आँसू के धार।
भुईयाँ जराके, जराथे भैया,
चिरई चिरगुन के घर - बार।
जर जाथे जी जंगल - जंगल,
कीरा - मोकरा करे करुणिम पुकार।
जाने कब राक्षस ले जोगी,
बनही जी ऐमन इंसान।
जाने कब मया बरसाही,
जाने कब रखही भुईयाँ के मान।
आभी नई संभलही अगर तो,
हो जाही जी बहुतेच देर।
ऐसेच अगर बरताव रिही जी,
हो जही भुईयां राख के ढेर।
का बताओं संगी भुईयाँ के पीरा,
धूँ - धूँ करके जरत हे पलारी।
हरियर सुघ्घर दाई के अँचरा,
हो गय हे जी कारी - कारी।
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