Wednesday, December 30, 2020

रायपुर से एच-एस-अरमो की रचना- मोर बस्तर

रचनाकार-एच-एस-अरमो, अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
विषय-""मोर बस्तर "" ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"मोर बस्तर " ।
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●●||••मोर बस्तर ••||●●
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बस्तर के बस्तरिया--
आजादी की जिन्दगानी--
आज हुयी है,दहशत भरी ।

नक्सलियों ने मचाया है आतंक--
जंगल-पहाड़ों की,हँसीन वादियां--
गोलियों व गोला बारूद की आवाजों,
से बैचैन व खामोश हो गया है ।

मोर बस्तर,प्रकृतिक छटा और--
दंतकथाओं से भरा पड़ा है,
एक ओर दन्तेश्वरी मन्दिर तो--
दूसरी ओर बारसुर का गणेश मूर्ति,
अनोखी छटा लिए है--।

बस्तर की प्राणदायिनी है--
इन्द्रावती नदी अविरल धारा से बहती,
चित्रकोट का जलप्रपात है जिसकी,
अनुपम छवि,पर्यटकों को है लुभाता ।

तिरथगढ़ का झरना बहता कल-कल-
कोटमसर की भूगर्भीय गुफ़ा--
मोर बस्तर की चहकती मैना और--
मस्ती में इठलाते वनभैसे व हिरण ।

मोर बस्तर की धरती में छिपा है--
लौह-अयस्क,अभ्रक व डोलोमाइट,
टिन,बाक्साइट,चूना,ग्रेनाइट पत्थर,
खनिज सम्पदा-कोयला व अन्य--।

आदिवासियों का है,जहाँ बसेरा,
वह है,मोर बस्तर का बस्तरिया,
गोंड,हलबी,मुरिया-माड़िया -
घोटुल है आदिम शिक्षा का केन्द्र ।

हलबी,गोण्डी व मुरिया-माड़िया--
बोली-भाषा हैं,द्रविड़ भाषा के रूप,
भोला-भाला है जीवन इनका---
रीति-रिवाज,सँस्कृति है अनूठी ,
पेनपाटा,करमा,ददरिया व नृत्य,
झूमते-गाते व होता मस्ती का आलम ।

सल्फी के पेड़ और उसी का पेय --
महुआ की दारु,तिखुर,डांग कन्द,
लाल चींटी की चटनी,सुक्सी मछरी,
शहद व जंगली कन्द-मूल,भाजी,
मुर्गे की लड़ाई,लान्दा का तरल पेय ।

कोसा पालन,सूअर पालन ,काष्ठ कला
बेल मेटल ,लोहे के साज-सामान--
तीर-कमान ,बरछी ,फरसा व कुल्हाड़ी,
हैं जीविका का साधन व हथियार ।

पर्यटकों की होती है भरमार--
लुभाते सघन वन,साल के ऊँचे पेड़,
जंगलों का घुमावदार मोड़ व रास्ते,
शहरी जीवन को,रोचक बनाती ।

मोर बस्तर की बात है अलग--
एक बार जो यहाँ पर आता,
सुनहरी यादों की मिठास ले जाता,
फिर एक बार आने को मन ललचाता।
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व्याख्या-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मोर बस्तर का दंडकारण्य क्षेत्र है बहुत मजेदार व मनोरम दृश्य को समेटे हुए है ।
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