सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-कविता
विषय-ममता
शीर्षक-माँ हूं ना....
अपने हर सपने को जोड़ देती हूं तुझसे
मेरा ही अक्स देखती हूं तुझमें
तेरे ललाट की तेज को देख
बार -बार तेरा मुख चुम लेती हूं
तेरे हर बात पे न्यौछावर हो
कभी-कभी ममता में अंधी
जरूरत से ज्यादा तेरी मांगे पूरी कर जाती हूँ
माँ हूं ना मोल तोल नही कर पाती हूँ
तुम्हारी जिज्ञासा भरी बातें सुनती हूं
तुम्हारे हर सवाल का जवाब ढूंढ लेती हूं
सिखाती हूं सही गलत में भेद करना
तुमसे भी बहुत कुछ सीख लेती हूं
ममता की मजबूत डोर से बंधे हैं
एक पल भी अलग ना हो पाती हूं
जब कभी गुस्से से हाथ उठ जाता है
दर्द से रात भर खुद छटपटाती हूं
एक अच्छा इंसान बना सकूँ तुझे
यही दुआ ईश्वर से मानती हूं
मुश्किलों का सामना कर सके तू
इस लायक बनाना चाहती हूं।
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