स्थान - दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक - २०२० के दुःख
कइसे गोठियाओं २०२० के गोठ,
जावत हे कतका ये हर देके दुःख
रोजी रोटी जम्मों काम होगे चौपट,
एक-एक दिन लगे हे पहाड़ बरोबर,
कोरोना हा जिनगी ला बना दिस दूभर,
हलाकान हे लोगन, का गाँव का शहर,
रोजी-रोटी बिन चैन के नींद नी परे,
गरीब दिहाड़ी मजदूर के पेट नई भरे,
लोग लइका के खेलइ कुदई नंदागे,
स्कूल, रस्ता, मैदान जम्मों सुन्ना परगे,
पढ़ई लिखई के घलो ठिकाना नहीं हे,
कोनो जगह लइका मन के आरो नई परे,
मनखे-मनखे के संगवारी बिछड़ गे,
नाता-रिश्ता महामारी के भेंट चढ़ गिस,
संसो मा हे लोगन घर कइसे चलावन,
अपन जीव ला घलो कइसे बचावन,
कुछु घलोक बने दिन के आस नही दिखे,
देश-परदेस, हर घर मे मंदी पसरे हे,
जीवन चलाये के बड़ चुनौती खड़े हे ,
मनखे ला कइसे-कइसे पीरा मिले हे,
याद रखबो,लिखाही इतिहास मुश्किल भरे रिहीस हे २०२० ।
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