जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-चौपाल
विधा-कविता( मुक्त छंद)
गांव अब शहर बन गये,
चौपाल के दिन ढह गये।
जमती थी पीपल,बरगद
नीम के पेड़ तले चौपाल।
चिडि़यों की वो चहचहाहट
बच्चे-बूढ़े की वो जमघट।
जमाने भर की सारी खबरें,
संवदिया बिना रुके कहता ।
हंँसी-ठिठोली अलाव जलाना,
ठिठुरते सुरती-पान चबाना।
सुनसान हो गये सब चौपाल,
करोना - कहर बना जंजाल।
आओ अब चौपाल को बचाएं,
पुरातन धरोहर को हम लौटाएं।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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