जिला :- महासमुंद
विषय :- चौपाल
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- चौपालों का हाल
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कैसे सुनाऊं तुम्हें सखा मैं,
चौपालों का हाल।
पहले जो गुलज़ार रहते थे,
आज हालत है बेहाल।
किलकारी बच्चों की गूंजती,
खेले जहां पर चंचल मन।
बांध लिया है आज यंत्रों ने,
हो गए सखा चौपाल निर्जन।
चौपाल वहीं जो वर्षों से,
चौसर की गवाही देते थे।
चौपाल वहां, जहां मिल जुल कर,
पत्तों के मजे सब लेते थे।
चौपाल वहीं जहां गांव - गांव में,
बैठक लोग बुलाते थे।
चौपाल वहीं जहां नट आकर के,
करतब हमें दिखाते थे।
चौपाल वहीं की जहां देवों का,
पण्डाल सजाया करते थे।
चौपाल वहीं जहां नृत्यांगना,
नित नृत्य दिखाया करते थे।
ना नृत्य रहे ना कलाबाजी,
विलुप्त हो रहे कलाकार।
धीरे - धीरे जर्जर होते,
धूमिल होते गांव के श्रृंगार।
सनै - सनै निज अश्मिता खोते,
बदहाल पड़े हैं चौपाल।
कार्यक्रम सब निरस हो गए,
लगते हैं केवल माया जाल।
कैसे सुनाऊं तुम्हें सखा मैं,
चौपालों का हाल।
पहले जो गुलज़ार रहते थे,
आज हालत है बेहाल।
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