स्थान - दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक-
*गुम हुए चौपाल*
डिजिटल है ये दुनिया
रिश्ते भी कुछ ऐसे ही
निभाये जा रहे हैं
ऑनलाइन शब्दों से ।
ये हँसी ठिठोली
ज्ञान विज्ञान की बात
बनावटी रिश्तों मे
उलझते जज़्बात ।
फिर भी ...
ना जाने क्यों
खोजती हैं आँखे
वो अपना सा गाँव
बड़ी सी चारपाई में
बुजुर्गो का रौब
पीपल की छांव
और
फुर्सत के पल में
जमती चौपाल ।
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