जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - मुक्त कविता
शीर्षक - " बाबा गुरु घासीदास "
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सत् के अलख जगाके बाबा,
सत् के रद्दा बताए।
घासीदास तैं मोर बाबा,
संत शिरोमणि कहलाए।।
आवा संगी सब जुर मिल के,
बाबा के महिमा ल गाबो।
गुरु जी के जन्मदिवस ल,
हंसी खुशी संग मनाबो।।
सत् के रहे तैं ह पुजारी।
पूजे तोला जम्मो नर-नारी।
ज्ञान के तैं ह अंजोर बगराए,
फल-फूल संग पूजा के थारी।।
सादा के तैंहं धोती पहिने,
डंडा भी हावय सादा।
सादा खंभा म सादा झंडा,
अब्बड़ सुग्घर तोर इरादा।।
अमरौतिन के तैं दुलरवा बेटा,
महंगू के आँख के तारा।
छाता पहाड़ म बाबा बिराजे,
गिरौदपुरी धाम हे बहुत न्यारा।।
मोहमाया के बंधना ल छोड़ के,
बैठे औंरा-धौंरा के छाँव म।
सत् के दिया जलोइया बाबा,
मुड़ी नवांवव तोर पाँव म।।
झांझर मंजिरा मांदर बाजे,
तोर महिमा के करत हे बखान।
पंथी नाचे पिरामिड बनाके,
आनंद म झूमे सब इंसान।।
छुआछूत ल तैं ह मिटाये,
करे तैंह नवाँ बिहान।
मानव-मानव ल एकेबरोबर बताये,
करे हमर बाबा उत्थान।।
जीव हत्या नशाखोरी ल बंद करके,
बाबा के तैं ह ध्यान धर ले।
हाथ जोड़ के करले विनती,
मन म तैं ह सुमिरन कर ले।।
मन म तैं ह सुमिरन कर ले।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
बहुत सुन्दर
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