Monday, December 28, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- चौपाल

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
     विधा - मुक्त कविता 
   शीर्षक - " चौपाल " 
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मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू, 
और पीपल का छाँव था। 
चौपाल पर रौनक रहती तब, 
कितना सुन्दर मेरा गाँव था।। 

सुख दुःख की बात जहाँ,
लोग बाँटा करते थे। 
अपने में ही नहीं तब, 
सब मिल जुलकर रहते थे।। 

बुजुर्ग सुनाते कथा कहानी। 
रामू काका और प्यारी नानी। 
गौरैया की थी मीठी चहचहाहट, 
अब पड़ी है चौपाल विरानी।। 

रामलीला का होता था आयोजन। 
किरदार निभाते राम और रावण। 
नृत्य,नाटक,गणेश जी की पूजा, 
लगते थे हृदय को बड़े ही मनभावन।। 

बच्चों का जहाँ लगता ढेरा था। 
होता जब भी नया सवेरा था। 
नहीं गूँजती अब किलकारी वहाँ, 
आधुनिकता का तब कोई न घेरा था।। 

क्यों मरघट सी चौपाल शांत है। 
क्यों रहते अब सब एकांत है। 
बसेरा जानवरों का ये हो गया, 
धुमिल यादें पर हकीकत दृष्टांत है।। 
 
लौट आओ अब तो शहर से, 
गाँव की मिट्टी बुला रही। 
बचा लो गाँव की प्यारी संस्कृति, 
विलुप्त होती जो जा रही।। 

कर ले तरक्की कितनी भी शहर। 
लोगों के अंतस में है ही जहर। 
माना है खामियाँ गाँव में अभी, 
पर यहीं मिलेगी शुकुन की लहर।।

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मौलिक रचना ( स्वरचित ) 
संतराम कुम्हार 
बलौदाबाजार (छ.ग.)

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