जिला :- महासमुंद
विषय :- शिक्षक
विधा :- मनहरण घनाक्षरी (कविता)
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शिक्षक है शिक्षा दाता,
ज्ञानवान ज्यों विधाता,
दीप जैसे ज्वलित हो,
आलोकित करें हैं।
गुरुवर ज्ञान पुंज,
जग में होती है गूंज,
खुद के संचित ज्ञान,
शिष्य में जी भरे हैं।
जीवन जी पतवार,
गुरु हैं खेवनहार,
मौजों में फंसी नाव को,
गुरुवर तरे हैं।
मार्ग के प्रदर्शक हैं,
शिष्य के प्रशंसक हैं,
निज के गुणों को नित,
शिष्य में जी भरे हैं।
मोती को ज्यों सीप जने,
तप से कंचन बने,
निज तपोबल गुरु,
शिष्य में जी धरे है।
संयम का पाठ देते,
साहस का ठाठ देते,
सत्य मार्ग सोहे सदा,
आत्मबल भरें हैं।
शिक्षक है शिक्षा दाता,
ज्ञानवान ज्यों विधाता,
दीप जैसे ज्वलित हो,
आलोकित करें हैं।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने एक शिक्षक के मानव जीवन में भूमिका को रेखांकित करने का प्रयास किया है।
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