जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - कविता
शीर्षक - " नारी की योग्यता "
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तनिक भ्रम न कीजिए,
योग्यता पर किसी भी नारी की।
अंग्रेजों को धूल चटाया,
इतिहास गवाह घटना ये सारी की।।
न समझो अबला न समझो बेसहारा।
मर्दानी थी, थी माँ के आँखों का तारा।
आहूति दे दी जान की अपनी,
दुश्मनों को मौत के घाट उतारा।।
केन्द्र परिवार का,नारी ही कहलाती है।
घर को भी वही स्वर्ग बनाती है।
क्यों मानू़ं मैं फिर नारी को कमजोर,
वही तो पूरे घर का बोझ उठाती है।।
सड़कों पर ये आटो चलाती।
अपनी जिम्मेदारी खूब निभाती है।
अपने परिश्रम और योग्यता से,
बच्चों को शिक्षा दिलाती है।।
देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचकर,
रचा एक नया कीर्तिमान।
भारत की बागडोर सम्हाली,
प्रतिभा पाटिल जिनका नाम।।
अंतरिक्ष की दुनिया में कदम रखकर,
चाँद-तारों से उसने बात किया।
नारी सशक्तिकरण का बनी उदाहरण,
कल्पना चावला ने ऐसा काम किया।।
नहीं कोई ऐसा क्षेत्र जहाँ,
नारी ने परचम न लहराया हो।
आसमान को चिरती इनकी उड़ाने,
अपनी योग्यता का लोहा न मनवाया हो।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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