जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-आधुनिकता और छायावाद
सुख के पल सहज
बीत जाते पल में,
दु:ख को मानव
किसे कब कहे।
प्रकृति मानव की
सहचरी बनी सदा
सामर्थ्य है जिसमें
सुनने सहने की ।
प्रकृति का जब होता
मानवीकरण जहाँ
है वहाँ छायावाद
उकरती कविता बन।
मानव के पीड़ा की
सहचरी बन चलती
तपिश मन का जो
पल भर में हरती।।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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