संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ. ग.)
विषय-आधुनिकता और छायावाद
विधा- *आलेख*,दिनाँक-16.12.20
*आधुनिकता और छायावाद*
आधुनिक हिंदी कविता की शुरुआत सन उन्नीस सौ से माना गया है। यह युग अनेक उपलब्धियों से भरा है ।इस कारण यह बहुत महत्वपूर्ण है ।इस समय हिंदी साहित्य का बहुत विकास हुआ ।इस काल में सांस्कृतिक, राजनैतिक ,एवं सामाजिक आंदोलनों का दौर चल रहा था। जिसके फलस्वरूप कविताओं में उसका स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है। हिंदी काव्य में नई चेतना एवं विचारों ने जन्म लेकर साहित्य के बहुआयामी क्षेत्रों पर अपना स्पष्ट छाप छोड़ा है। इस काल में धर्म ,दर्शन, कला, एवं साहित्य सभी क्षेत्रों में नए दृष्टिकोणों का जन्म हुआ है।
आधुनिक हिंदी कविता को अब तक छह विकास क्रमों में बाँटा गया है ।जिसमें तीसरा कालक्रम सन 1920 से 1936 तक का समय छायावाद के नाम से जाना जाता है। हिंदी कविता में आधुनिकता तथा नवीन युग के सूत्रपात का श्रेय छायावादी युग को जाता है। द्विवेदी युगीन काव्य प्रवृत्तियों की प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदी में छायावाद का जन्म हुआ है।
डॉ रामकुमार वर्मा के अनुसार- "परमात्मा की छाया आत्मा में और आत्मा की छाया परमात्मा में पड़ने लगती है वही छायावाद है।"
डॉ नगेंद्र छायावाद ने छायावाद को- "स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह माना हैं।"
*छायावाद की विशेषताएं*-
1.विषय गत 2.विचारगत 3. शैली गत
*विषय गत विशेषताएं*-
1. *नारी सौंदर्य एवं प्रेम चित्रण*- छायावादी कवियों ने स्थूल चित्रण की अपेक्षा सूक्ष्म चित्रण को महत्व दिया है। प्रेम में रूढ़िगत मर्यादा को स्वीकार ना कर वैयक्तिकता को स्थान दिया है। प्रेम में असफलता, विरह और निराशा को स्थान मिला है।
2. *प्रकृति* - व्यंजना प्रकृति के सौंदर्य और प्रेम का वर्णन इनकी विशेषता रही है। प्रकृति में नारी और प्रेयसी दोनों की छवि देखते हैं। इस काल में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।
3. *अलौकिक प्रेम या रहस्यवाद* इसमें अलौकिक प्रेम को महत्व दिया गया है। रहस्यवाद में पहले वियोग और बाद में संयोग को स्थान मिला है।
2. *विचार गत विशेषताएं* निम्न है
1.दर्शन के क्षेत्र में अद्वैतवाद एवं सर्वात्मवाद।
2.धर्म के क्षेत्र में रूढ़ियों एवं बाह्य चारों से मुक्त मानव हित चिंतन।
3.समाज के क्षेत्र में समन्वयवाद।
4.राजनीति के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय एवं विश्वशांति का समर्थन।
5.पारिवारिक एवं दाम्पत्य जीवन के क्षेत्र में हृदय तत्व की प्रधानता।
6.साहित्य के क्षेत्र में कलावाद या सौंदर्य वाद।
3. *शैली गत विशेषताएं*- छायावाद की प्रमुख प्रवृत्तियां हैं।
अ.मुक्तकगीत शैली ब.प्रतीकात्मकता
स.प्राचीन एवं नवीन अलंकारों के प्रयोग की अधिकता
द. कोमल कांत पदावली
ई. *गीत शैली के प्रमुख तत्व*- वैयक्तिकता, भावात्मकता, संगीतात्मकता, संक्षिप्तता और कोमलता।
*छायावाद के प्रमुख कवि एवं रचनाएं*
1. *जयशंकर प्रसाद*
*रचनाएं*- चित्राधार, प्रेम पथिक, करुणालय, महाराणा का महत्व, कानन कुसुम ,झरना ,आँसू, लहर आदि
2. *सुमित्रानंदन पंत*
*रचनाएं* -वीणा, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन ,युगांत ,युगवाणी ,ग्राम्या, युगांतर, उत्तरा, अतिमा ,वाणी,आदि।
3. *सूर्यकांत त्रिपाठी निराला*
*रचनाएं*- परिमल, अनामिका, तुलसीदास ,कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला ,नए पत्ते, अर्चना, आराधना, आदि।
4. *महादेवी वर्मा*
*रचनाएं* -निहार, रश्मि नीरजा, सांध्यगीत ,दीपशिखा ,आदि।
इनके अतिरिक्त मुकुटधर पांडे ,भगवती चरण वर्मा, रामकुमार वर्मा, नरेंद्र शर्मा ,रामेश्वर शुक्ल ,आदि भी छायावादी कवि हैं।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)
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