स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"मोर बस्तर"
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बस्तर के धरती हरियाए
प्रकृति हर अनुपम छटा बिखराए
सरग कहूँ त सबो झन पतियाएं
इहां क़े बात अबड़ सुहाए।
बस्तर तहियां जमाना के
याद ला बरोबर संजोए
रामायण के दंडकारण्य और
महाभारत के कौशल छेत्र ला बसाए।
आदिवासी संस्कृति में रंगे
गोंड,मारिया,भूरिया,भतरा
अउ हलबा, धुरवा समुदाय बसें
इहां के मनखे के गोठ गुऱतूल लगे।
इंद्रावती नदी के तट
कल-कल बहे सरपट
पहाड़ ऊपर ले गिरे अइसन
झरना ला देखव मोहे कइसन।
रकम- रकम के संपदा
इहां के धरती मां हे गड़े
बड़खा- बड़खा महल घलो
अबड़ पुरना हे ख़ड़े।
मंदिर केे नावँ मन ला
नई लेहु त नई बने
दंतेश्वरी इहां के देवी हवे
इखरे बर दंतेवाड़ा नाव पड़े।
लोकनृत्य तीज-तिहार
आनि-बानी के मेला लगे
इहां के दशहरा ला का कहों संगवारी
अबर सुघ्घर 10 दिन तक चले ।
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