स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"औद्योगिक और कविता"
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लेखनकला से व्यावहारिकता का
विज्ञान से हुआ विकास
प्रौद्योगिकी का फैला प्रकाश
नित्य ,नूतन मशीनों से
कल पुर्जों कारखानों से
वर्तमान ने लिया एहसास
कल को पीछे छोड़
दूरी के बंधन तोड़
घर में बैठा मानव कार्य करें
असीमित और पुरजोर
दोगुना उत्पादन बढ़ाकर
प्रदूषण बहुत बड़ा कर
चला जा रहा अंधकार की ओर
प्रौद्योगिकी की कविता बना
या कवि ही प्रौद्योगिक में सना
कुछ अता-पता नहीं चलता
मानो शब्द भी उद्योग के उत्पादन
सरीखे बनते हों आजकल
लेखन भी कुछ अटपटा सा लगा
फटाफट करने चलते हैं
निर्माण में गलते हैं
फिर भी बनाने का शौक रखकर
उद्योग- धंधे ख़ड़े करते हैं
पर थोड़ा पता तो कर लें
उत्पादन सूट भी कर रहा है कि नहीं!
जिसे हम अंधाधुंध लिखते और उगलतेे हैं।
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