निवास- बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला- रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विधा-कविता "छ्न्द मुक्त"
विषय-शिक्षक ।
शीर्षक-ज्ञान -प्रदाता ।
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=====%%ज्ञान -प्रदाता %%=====
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हे !गुरुवर तुम ज्ञान-प्रदाता,
अज्ञानता दूर करने के लिए,
शिक्षा का प्रकाश फैलाता ।
तुम बिन,जीवन में,रहे अँधेरा,
जिसे मिलता है,सच्चा ज्ञान-प्रकाश,
उसका भवसागर हो जाता है पार ।
शिक्षक होता ,कुम्हार की तरह,
गीली मिट्टी को देता है,
नवाकार,सृजन के साथ ।
जीवन तो हम,
कैसे भी जी लेते,पर--
सद्ज्ञान कहाँ से पाते ।
शिक्षक का दर्जा है महान् ---
वो राष्ट्र का निर्माता--
नवयुवकों में,ज्ञान का प्रकाश फैलाता।
अच्छे शिक्षक मिलते,बमुश्किल से,
जिन्हें मिल जाए,इनका साथ,
गुणवान व बनते वो महान् ।
आओ शिक्षक के,महत्व को जाने,
उनका मान-सम्मान करें,
सदा उनके ज्ञान का,अमृत-पान करें ।
सबका जीवन,सफल हो जायेगा,
तर्क-वितर्क व वाद-विवाद का,
तू सही अर्थ ,तभी तो समझ पायेगा ।
गुरु बिन ,मिले न ज्ञान --
सत्संग बिन,मिले न सद् -विचार,
अक्षर ज्ञान बिन,होता है,
काला अक्षर भैंस बराबर--।
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दिनांकः-01/12/2020,सोमवार ।
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व्याख्या-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मानव जाति के लिए गुरु/शिक्षक का स्थान बहुत ऊंचा होता है और हमें उनका सम्मान करना चाहिए ।
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