जिला :- महासमुंद
विषय :- खगोल विज्ञान
शीर्षक :- खगोलीय पिंड
विधा :- छंद मुक्त कविता
#######################
अनोखा दृश्य मनोरम,
कि व्योम नहीं श्यामपट हो।
उसमें खड़ी से उकेरे तारों में,
एक - दूजे से सुन्दरतम दिखने की हट हो।
हट को तोड़ता श्रृष्टि का चित्रकार,
उकेरता देता है एक चांद बड़ा सा।
देखकर सुन्दरता जिसकी,
सितारे हो जाते खामोश लिए मुख अपना सा।
फिर बिखरती धुंधली रौशनी,
सूरज के रिक्तियों को भरती।
काम से त्रस्त थके मन को,
मीठी नींद के आगोश करती।
फिर उठाने को जग को नित,
मल देता कोई अरूणिम रंग।
कि पड़ती जो रवि की किरणें आँखों में,
हो जाती मनु की निद्रा भंग।
फिर नव ऊर्जा से हो जाती,
नवल कृत्य संग नई भोर।
चहल पहल हो जाती गुलज़ार,
हर्षित हो उठता उर कोर।
ऐसे ही खगोलिय पिंडों संग,
नित चलता जाता मानव जीवन।
प्रतिपल घड़ी की सूइयों सा,
चंचल, अविराम यह मानव मन।
#######################
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने खगोलीय पिंडों के आवागमन से संसार में हो रहे दैनिक परिवर्तन को चित्रित करने का प्रयास किया है।
No comments:
Post a Comment