जिला-कांकेर,छग
विषय-खगोल विज्ञान
शीर्षक-आकाशगंगा
विधा- कविता (मुक्त छंद)
जीवन रुपी आकाश में,
अंतरिक्ष की तरह,
कई खगोलीय पिंड
दिखाई देते हैं ।
जिसमें उल्का पिंड,
निहारिका में कौतुहल
अनगिनत चांद
सितारों का झिलमिल
करना आनंदित
करता हैं मन को ।
रात को निहारना
आकाश गंगा को,
टूटते तारों से,
विश मांगना बहुत
अच्छा लगता है ।
महसूस होता है कि
सारा आकाश
हमारा है और तारे
जमीं पर हैं ,एक
ही विश कि धरती
का हर सितारा,
चमके ध्रुव तारे की
तरह आकाश गंगा में ।।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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