स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- आलेख
शीर्षक -"आदमी एक खिलौना है"
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आदमी की पहचान उसके आदमियत से होती है।आदमियत कुछ और नहीं इंसानियत ही है ।आदमी एक ऐसा स्थान प्राप्त करता है संसार में जहां से उसे दो रास्ते मिलते हैं एक हैवानियत की ओर जाता है और दूसरा इंसानियत की ओर जाता है ।आदमी वही है जो इंसानियत की राह पकड़े वरना वह राक्षस बन जाता है फिर वह किसी प्राणी में गिनती नहीं होता है ,उसकी प्रकृति राक्षस के समान हो जाती है ,जो निर्दई, दुराचारी, दुर्जन की पराकाष्ठा में जकड़ा हुआ होता है।
आदिकाल में आदमखोर की तरह जीवन यापन करने वाले आदमी में सीखने की प्रवीण प्रवृत्ति ने उसकी छवि को साफ और स्पष्ट किया है । संसार में आदमी ने अपने आपको अन्य पशुओं से बेहतर सिद्ध किया है । निरंतर विकसित हो रही बुद्धि से आदमी बेहतर और बेहतर होता चला गया।
वर्तमान में उसकी बेहतरी ने ही उसकी सोंच में इतना परिवर्तन कर दिया है कि आज वह आदमी अलग तरह का भी बन चुका है । आदमी के कई भेद देखने को मिलते हैं जैसे कुछ आदमी जीवन भर खुद को और दूसरों को कोसते रहते हैं ।ना खुद खुश रहते हैं और ना दूसरों को खुश रहने दे हैं ।दूसरे किस्म के आदमी वे होते हैं जो खुल कर जीते हैं और खुद तो हंसते हैं और दूसरों को भी हंसाते रहते हैं और तीसरे दर्जे में वे आदमी आते हैं जो जीवन भर सोच विचार में उलझे रहते हैं ।ऐसे काम तो सही करते हैं पर अच्छे बुरे के चक्कर में इनके जीवन के रस की मिठास कहीं न कहीं फीकी पड़ जाती है ।
एक हिंदी फिल्म आदमी खिलौना है में समीर जी द्वारा लिखित एक गीत आदमी खिलौना है .....याद आ रही है।मुझे तो इसकी हर एक शब्द सही प्रतीत होती है । संसार के रंगमंच पर ऊपर वाले की उंगलियों के इशारे पर नाचने वाला आदमी एक कठपुतली ही तो है जो न चाहते हुए भी नाचने को मजबूर है।आदमियों से हो रही गलतियों को ऊपरवाला संभालता क्यों नहीं जबकि डोर तो प्रभु के हाथों थमी है।
ऊपर वाले कि मर्जी बिना हिलता नही इक पत्ता जो होना है वो होगा इसलिए बिना चिंता किये आदमियों को खुद के साथ- साथ दूसरों के लिए भी जीना चाहिए ।ऊपर वर्णित दूसरे प्रकार के आदमियों की तरह जी भर जिओ और औरों को भी जीने दो का परिपालन करने के साथ खुद के जीवन को खुशहाल बना कर देश को खुशहाल बनाने में अवश्य भागीदार बनना चाहिए।
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