Monday, November 2, 2020

कांकेर से मीरा आर्ची चौहान की रचना- ये कैसी मजबूरी

रचयिता-मीरा आर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-ये कैसी मजबूरी
विधा-कविता (मुक्त छंद)

अन्नदाता अन्न उपजाता,
क्यों भूखा सोता रातभर|

बुनकर बुनता रोज कपड़े,
क्यों ठंड में ठिठुरता रातभर|

पीड़ा सह कर काम करता,
पगार न मिलती पूरी कभी|

बीमार हो तो छुट्टी न मिलती,
हाय,कैसी मजबूरी है इनकी|

करोना का कहर यूं  है छाया,
अपनों को भी तन्हा ही पाया||

इस वायरस  का डर यूं सताया,
मौत को मुँह बाये  खड़ा पाया|

जीवन भर धन खूब कमाया,
चैन से कभी भी रह न पाया||

करोना ने ही बढ़ाई सबसे दूरी,
हाय,हाय! ये कैसी मजबूरी||

मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
______,_______,_______

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