जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-ये कैसी मजबूरी
विधा-कविता (मुक्त छंद)
अन्नदाता अन्न उपजाता,
क्यों भूखा सोता रातभर|
बुनकर बुनता रोज कपड़े,
क्यों ठंड में ठिठुरता रातभर|
पीड़ा सह कर काम करता,
पगार न मिलती पूरी कभी|
बीमार हो तो छुट्टी न मिलती,
हाय,कैसी मजबूरी है इनकी|
करोना का कहर यूं है छाया,
अपनों को भी तन्हा ही पाया||
इस वायरस का डर यूं सताया,
मौत को मुँह बाये खड़ा पाया|
जीवन भर धन खूब कमाया,
चैन से कभी भी रह न पाया||
करोना ने ही बढ़ाई सबसे दूरी,
हाय,हाय! ये कैसी मजबूरी||
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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