जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - लक्ष्य
विधा - आलेख
शीर्षक - विद्यार्थी जीवन का लक्ष्य
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// विद्यार्थी जीवन का लक्ष्य //
परीक्षा समय तबीयत बिगड़ जाने के कारण मैं कक्षा आठवीं में अनुत्तीर्ण हो गया था । दो साल पढ़ने के बाद भी 56 प्रतिशत ही अंक ला पाया जो उस जमाने के हिसाब से संतोषजनक परिणाम था । यह सन् 1985 ई. की बात है । तब तक मैं एक सामान्य व संकोची किस्म का बालक था व ज्यादा होशियार नहीं था ।
हाई स्कूल आने के बाद मैं अपने भविष्य व कैरियर को लेकर चिंतित हो गया । वैसे तो पहले भी खूब मेहनत करता था किन्तु अब मैं दृढ़ निश्चय किया कि मुझे पढ़ाई में सबसे आगे रहना है । मैंने लक्ष्य निर्धारित किया कि अब मुझे हमेशा कक्षा में फर्स्ट आना है । मैं कड़ी मेहनत करने लगा ।
आज से 36 वर्ष पहले हमारे गाँव मे बिजली नहीं थी । चिमनी , लालटेन एवं मिट्टी के दिया से रात में पढ़ाई करता था । घर मे सुविधा के नाम पर ठीक से एक कुर्सी भी नहीं था । पता नहीं मुझमे इतनी प्रेरणा व लगन कहाँ से आई कि मुझे पढ़ाई के सिवाय कुछ भी अच्छा नहीं लगता था । दिन भर खाट पर बैठकर पढ़ता रहता । तेज धूप में भी पढ़ने बैठ जाता । रात में जमीन पर बैठकर पढ़ता । दोनो घुटने मोड़कर बैठ जाता और झुककर पढ़ता । नींद आने पर ऐसे ही पढ़ते - पढ़ते अक्सर सो जाता । घरवाले मुझे जगाते थे । विश्वास कीजिये इसी कारण दिए व चिमनी की लौ से मेरे माथे के ऊपर का बाल कभी - कभी हल्का सा झुलस जाता था ।
मेरे माता - पिता को पढ़ाई बन्द करने और बाहर घूमने जाने के लिए कहना पड़ता । दूसरी बात 4 किलोमीटर दूर बिलाईगढ़ पैदल पढ़ने जाता था । बहुत बाद में साइकिल का उपयोग किया । चूँकि रास्ते मे एक बड़ा सा नाला पड़ता है तो बरसात में तैरकर भी स्कूल चला जाता । दुर्भाग्य से आज पर्यन्त उस नाले पर पुल नहीं बन पाया है जबकि ब्लॉक व तहसील बिलाईगढ़ से लगा हुआ है । दिया तले अँधेरा तो रहता ही है । उस समय 12 -15 लड़के ही पढ़ने बिलाईगढ़ जाते थे । लड़कियों को पढ़ने नहीं भेजते थे । एक और अविश्वसनीय व मजेदार बात ये है कि कक्षा 11 वीं तक मैं हाफ पैंट एवं हाफ कमीज में ही स्कूल जाता था वह भी केवल एक ही सेट ।
इस प्रकार पूरे 4 वर्ष तक मैं जी - जान से पढ़ा । सौभाग्य से सभी विषय के शिक्षक भी बहुत अच्छे मिले थे । कक्षा 9 वीं में 70% अंकों के साथ कक्षा में प्रथम आया । कक्षा 10 वीं में भी 71% मिला और प्रथम आया । इसी वर्ष 1987 को जब 10 वीं में था तो स्कूल की तरफ से अनुशासन व पढ़ाई के लिए मुझे पुरस्कार एवं प्रमाण पत्र प्रदान किया गया । इसी समय हाई स्कूल से ही मैं काव्य रचना करने लगा था । कक्षा 11 वीं में और उछाल आया । गणित संकाय का विद्यार्थी था । पूरे क्लास में 81% अंक लाया और पुनः प्रथम स्थान मिला । मैं स्कूल का टॉपर स्टूडेंट बन गया था । आज भी हायर सेकंडरी स्कूल बिलाईगढ़ के प्राचार्य कक्ष में मेरिट विद्यार्थियों की सूची में मेरा नाम लिखा हुआ है ।
गणित के शिक्षक श्री के.सी. साहू सर जी का ट्रांसफर हो जाने से 12 वीं में भटगांव चला गया । वहाँ भी त्रैमासिक परीक्षा मे प्रथम आने पर मैं विद्यार्थियों व शिक्षकों के बीच लोकप्रिय हो गया । सन् 1989 में मैं 12 वीं बोर्ड में 78% अंकों के साथ द्वितीय स्थान प्राप्त किया । फिर भी मुझे खुशी थी क्योंकि भटगांव के अधिकांश विद्यार्थी ट्यूशन लेते थे । मैं कभी कोई ट्यूशन नहीं लिया । बारहवीं में 81% पाने वाले टॉपर विद्यार्थी मेरे से इतना कम्पीटिशन किये की परीक्षा के समय उनको बुखार आ गया था ।
इस प्रकार 9 वीं से 12 वीं तक का चार वर्ष मेरे जीवन का स्वर्ण काल था । फिर शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय रायपुर से स्नातक किया । बाद में अंग्रेजी में एम. ए. और फिर बी. एड. किया । वर्तमान में व्याख्याता के पद पर कार्यरत हूँ । मेरी इस सफलता के पीछे मेरे माता - पिता और शिक्षकों का योगदान भी कम नहीं है । आज समझ मे आता है कि बचपन मे ठोकर मिलने पर संकल्प के साथ जो लक्ष्य का बीज बोया था वही फल - फूल रहा है ।
यह कोई कहानी नहीं है ।मेरे जीवन की सत्य घटना है जिसे संक्षेप में प्रस्तुत किया हूँ ।इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है । तात्पर्य यही है कि एक छोटा सा भी लक्ष्य मनुष्य के जीवन को सफलता के शिखर पर पहुँचा देता है ।
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