राज्य - छत्तीसगढ़
शीर्षक - मुसव्विर हूँ मैं भी।
विधा - हिंदी उर्दू कविता
मुसव्विर हूँ मैं भी एक तर्ज़ की,
जज्बातों को अल्फाजों का रूप देती हूँ।
कुछ तसव्वुर भरी हिकायतें,
कुछ जीस्त भरे नगमें लिखती हूँ।
कागज और किल्क हैँ हम-नफ़स मेरे,
जमाने के शोर से गाफिल रहती हूँ।
मुसव्विर हूँ मैं भी एक तर्ज़ की,
जज्बातों को अल्फाजों का रूप देती हूँ।
महरूम हूँ आज भी एक अच्छे रहबर से,
किसी में गुलजार तो किसी में ग़ालिब जो ढूँढती हूँ।
थक गई है डायरी मेरी बातें सुन-सुन के,
फिर भी मुझपे ये तोहमत है कि मैं बातें कम करती हूँ।
मुसव्विर हूँ मैं भी एक तर्ज़ की,
जज्बातों को अल्फाजों का रूप देती हूँ।
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