निवासी:-कांकेर(छ. ग.)
विषय:-आदमी
शीर्षक:-आदमी हूँ न
विधा:-छंद मुक्त कविता
आदमी हूँ न,
आदमी के काम आता हूँ।
जानवर आये आंगन में,
तो डंडे ही नहीं मारता,
पत्थर मिले तो,
पत्थर से मार भगाता हूँ।
आदमी हूँ न,
आदमी के काम आता हूँ।
परेशानियाँ खुद की हल न होती,
पर दूसरों को मार ताने,
उनका दुख बढ़ाता हूँ।
आदमी हूँ न,
आदमी के काम आता हूँ।
महीने का खर्चा चला सकूँ,
इतनी तनख्वाह पाता हूँ।
पर दस रुपये की सब्जी के लिए,
मोल भाव कर जाता हूँ।
आदमी हूँ न,
आदमी के काम आता हूँ।
दुर्घटना से तड़प रहा कोई,
चिकित्सालय पहुंचना छोड़,
पहले वीडियो बनाता हूँ।
आदमी हूँ न,
आदमी के काम आता हूँ।
अपने बच्चे संभलते नहीं,
दूसरों के बच्चों का व्यवहार,
दुनिया को बताता हूँ।
आदमी हूँ न,
आदमी के काम आता हूँ।
मिला जो उसका न किया
शुक्रिया कभी,
न मिला उसकी शिकायतें
कर जाता हूँ।
आदमी हूँ न,
आदमी के काम आता हूँ।
अपनी गलतियों की गिनती नहीं,
पर खामियां औरों की,
ढूंढता जाता हूँ।
आदमी हूँ न,
आदमी के काम आता हूँ।
-कु.गरिमा पोयाम
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