जिला :- महासमुंद
विषय :- आदमी
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- आदमी आदमी न रहा।
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एक दौर था, उस दौर में,
आदमी, आदमी के हृदय को छुआ करता था।
एक दूजे के सुख - दुख बाँटता,
आदमी, आदमी हुआ करता था।
प्यार भरे जीवन का वो दौर न रहा,
कि अब आदमी, आदमी न रहा।
दिखावे की चादर ओढ़े,
जरा सा मतलबी हो गया है।
अपने भी गैर हो गए हैं,
और वह गैरों के सपनों में खो गया है।
खुद ही दर्द देता है अब,
दर्द हरने वाला मरहम ना रहा।
कि आदमी, आदमी ना रहा।
नेह, दया, त्याग व भाईचारे की कब्र पर,
निज स्वार्थ का उसने आसियाना बनाया।
मानव ने निज सुविधा को पैसे बनाये,
पैसे ने मानव को दीवाना बनाया।
विरासत को थामकर चलने वाला,
अब कोई पंरपरा न रहा।
कि आदमी, आदमी न रहा।
मेहनत से कतराते सब हैं,
अपनी छोड़ औरों की सोचें कौन अब है।
मिलावट भरे जीवन में,
हर मुख में मुखौटा चढ़ा है।
किसी को
आलम यह है कि बिना मिलावट,
आज गरल भी ना रहा।
कि आदमी, आदमी न रहा।
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