स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"भ्रटाचार की राजधानी"
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आओ सुनाऊँ एक कहानी
भ्रष्टाचार की है राजधानी
राजनीति हो या सहकारी
फैल रही भीषण बीमारी
कोरोना का प्रकोप छाया
फिर भी पैसों की ही माया
इतनी भयंकर है महामारी
फिर भी हो रही कालाबाजारी
आओ सुनाऊँ एक कहानी
भ्रष्टाचार की है राजधानी
दफ्तर हो या हो हॉस्पिटल
दलाली की बहती गन्दी नाली
बचाने वाले हाथ खून से सनें
अंगों की करते हैं तस्करी
मिठाई हो या हो राशन
मिलावटी खाये दुनिया सारी
आओ सुनाऊं एक कहानी
भ्रष्टाचार की है राजधानी
भ्रष्ट तंत्र भ्रष्ट हुआ मंत्र
पूजा-पाठ में डूबा सन्यासी
बन गया है व्यभिचारी
बाप बेटे का नहीं और
बेटा-बाप को पूछता नहीं
दोनों लूटते एक दूसरे को
करते एक दूसरे से गद्दारी
आओ सुनाऊँ एक कहानी
भ्रष्टाचार की है राजधानी
गुंडों का राज है चलता
समझ जाओ उनका धंधा
पुलिस के डंडे पढ़ते उन्हें
जीते हैं जो इमानदारी
कुछ भी सही नहीं यहां
गुम हुआ लोकतंत्र कहाँ
बस बेबस बैठी जनता
देख रहें हैं मौन धारी
आओ सुनाऊँ एक कहानी
भ्रष्टाचार की है राजधानी
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