ग्राम - बुलाकी
जिला - रायगढ़ छत्तीसगढ़
विषय - ज्ञान
विधा - आलेख
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*ज्ञान*
किसी वस्तु की वास्तविकता और उसकी संपूर्णता को जानना ही ज्ञान है। हर वस्तु रूप,गुण स्वभाव, धर्म से संपूर्ण है। इसी संपूर्णता को जानना ज्ञान है। अस्तित्व में तीन वास्तविकता है शून्य( व्यापक सत्ता) जो सर्वत्र व्याप्त है और उस शून्य व्यापक सत्ता में जड़-चैतन्य इकाई समाहित है। व्यापक, जड़ ,चेतन इसकी संपूर्णता को जानना ही ज्ञान है। अस्तित्व में तीन संपूर्ण ज्ञान है-
(1)अस्तित्व दर्शन ज्ञान
(2) जीवन (आत्मा)दर्शन ज्ञान
(3) मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान अर्थात् परमात्मा आत्मा और आचरण( नियम )को जानना ही ज्ञान है। वर्तमान में स्कील ज्ञान को ही ज्ञान मानकर इसी का अध्ययन अभ्यास हो रहा है ,फिर भी मनुष्य संतुष्ट नहीं है। क्योंकि स्कील ज्ञान अर्थात भौतिक वस्तु का ज्ञान शरीर सापेक्ष ज्ञान है ।भौतिक ज्ञान से क्षणिक सुख की प्राप्ति होती है, अतः क्षणिक सुख से मनुष्य संतुष्टि नहीं होता है। क्योंकि शरीर की स्थिति गति सीमित है, अतः शरीर सुख में निरंतर सुख की प्राप्ति नहीं है। इसलिए स्कील( भौतिक ज्ञान) से तृप्त नहीं होता। मानव दो वास्तविकता शरीर और जीवन (आत्मा) के संयुक्त स्वरूप में रचित हैं ।शरीर है तो जीवन है और जीवन है तो शरीर है ,दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। अतः वर्तमान में शरीर का तो बहुत ज्यादा कार्यक्रम है, जीवन का कोई कार्यक्रम नहीं है ।निरंतर सुख वाला भाग छूटा हुआ है। जीवन दर्शन ज्ञान को समझना अर्थात स्वयं को समझना और उसके नियम को समझना और जीवन का आधार को समझना ही संपूर्ण ज्ञान है। इसी ज्ञान का समझ न होने से मानव जाति अव्यवस्था में जीता हुआ भय, आक्रोश, शंका, दरिद्रता में जीता हुआ ,समस्या ग्रस्त है। समस्या से मुक्ति पाने का ज्ञान ही, सर्वस्व ज्ञान है। समझ की कमी को पूरा करना ही ज्ञान है। मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता ज्ञान है। ज्ञान के बिना मनुष्य की जिंदगी निरस है। अतः भावमय युक्त ज्ञान को जानना वर्तमान में समीचीन आवश्यकता है। मानव जाति में भाव को समझना बाँकी है, इसी के लिए प्रयास की आवश्यकता है। ज्ञान से ही मनुष्य तृप्त होता है। हर मनुष्य का लक्ष्य तृप्ति है ।
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उर्मिला सिदार
रायगढ़ छत्तीसगढ़
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