Monday, November 9, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- ज्ञान का स्त्रोत

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
     विधा - मुक्त कविता 
   शीर्षक - " ज्ञान के स्त्रोत "
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 *माता-पिता* -
प्रथम ज्ञान माता-पिता से, 
जीवन की नींव बनाते हैं। 
है ये साक्षात् भगवान का रुप,
जो ज्ञान की दीप जलाते हैं।। 

नैतिक ज्ञान के ये भंडार हैं। 
व्यवहार ही जीवन का सार है। 
आदर करो सभी बड़े-बुजुर्गों का, 
मिलता इनसे सम्मान और प्यार है।। 

माता-पिता के चरणों में, 
गीता,रामायण,वेद,कुरान है। 
बाइबिल और गुरु ग्रंथ भी यही, 
इनसे ही मिलता सभी धर्मों का ज्ञान है।। 

 *गुरु* -
गुरु महिमा अनमोल है, 
नहीं लिख सका कोई लेख। 
गुरु ज्ञान को आत्मसात कर ले, 
फिर जिंदगी तेरी देख।। 

ज्ञान की प्रकाश फैलाते गुरुवर,
सत्य की राह हमको दिखाते हैं।
पाप-पुण्य में भेद बताकर, 
जीवन जीना ये सिखाते हैं।। 

गुरु की महिमा का मैं,
अब कैसे करुँ बखान। 
ज्ञानदाता भाग्य विधाता, 
गुणों की है ये खान।। 

 *पाठशाला* -
ज्ञान का यह पवित्र मंदिर है। 
टूटते यहाँ भ्रम की जंजीर है। 
पाठशाला की यह पावन धरा,
जैसे पवित्र गंगा की ये नीर है।। 

ज्ञान सिखाता विज्ञान सिखाता।
मानव को समाज धर्म बताता। 
देश की बागडोर सम्हालने, 
वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर बनाता।।

पाठशाला जाकर सबने अपना, 
भविष्य को प्रकाशमान किया। 
विवेकानंद,कलाम के पद चिन्ह पर चलकर,
रोशन ज्ञान से सबका नाम किया।। 
                                                          
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मौलिक रचना (स्वरचित) 
संतराम कुम्हार 
बलौदाबाजार (छ.ग.)

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