स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त
शीर्षक - ज्ञान का सदुपयोग
ज्ञान है सबको यहांँ
क्या भला है, क्या बुरा
कर्म में शामिल है फिर भी
लोगों की अज्ञानता,
पुस्तक है ,शिक्षक है,
कण-कण में ज्ञान भंडार है,
अल्प में सरलता है, तो
अति में अभिमान है,
फिर कैसे कोई बने महान ?
इसका भी लें ज्ञान,
कर्म का आधार ज्ञान,
व्यवहार है ज्ञान,
स्वयं को इसमें ढाल
वरना हर ज्ञान तेरा
निर्रथक है ये जान,
कितने ज्ञानी रावण जैसे
कुकर्म से घृणित हुये
ज्ञान का सदुपयोग कर
बने हैं कितने विवेकानंद ।।
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