संबलपुर,जिला-कांकेर,( छ.ग.)
विषय-खगोल विज्ञान
*अंतरिक्ष एवं सौरमण्डल*
अंतरिक्ष में कई आकाश गंगा,
निहारिकाएं है भारी,
उसमें एक नन्हा सा
सौर मंडल है भारी।
आठ-आठ ग्रहों का संगम,
सूर्य है जिसका मुखिया प्यारा,
वही कहलाता सुंदर
अन्तरिक्ष हमारा।
बुध दिनकर के सबसे
निकट है रहता,
उसे झेलना पड़ता है
बड़ा संकट।
वही पास में शुक्र
का रहता है निवास,
सबसे चमकीला ग्रहों
में है वो खास।
क्रम में आगे पृथ्वी हमारी,
जीव -जंतु जिसमें
समाती दुनियाँ सारी,
अथाह विस्तृत नभ
में धरा हमारी आदित्य का
चक्कर लगाती जिसमें बेचारी।
धरा जितना प्यारा
और सुंदर नहीं ग्रह,
कोई और नहीं
सौरमण्डल के दर।
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती,
रवि का है परिक्रमा करती,
इसी से दिन -रात
का सृजन है करती।
सूर्य जिधर मुखातिब हो,
वह दिन पीछे रात ,
इसी क्रम में दिन -रात
धरा पर है आती।
पृथ्वी के बाद मंगल
ग्रह आएं, अपना अजब गजब रूप दिखाएं।
वृहस्पति है सबसे विशाल,
सड़सठ ग्रह जिसने है पाले,
आता फिर शनि ग्रह
जो रहते वलय के हवाले।
नीला रंग बर्फीला,
अरुण है कहलाता,
एक और ग्रह रत्नाकर
के नाम वरूण है कहलाता।
खगोल शास्त्री और ज्योतिषों
की चलती रहती गणनाएं,
वही बताते हमारी
पृथ्वी की संरचनाएं।
*व्याख्या*-प्रस्तुत कविता में सौरमण्डल और ग्रहों का वर्णन किया गया है।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)
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