पता------- -- कसडोल , छत्तीसगढ़
विषय ------ धनतेरस
विधा ------- स्वेच्छित/ काव्य
शीर्षक----- धनतेरस के तेरह दिये .....
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सरहद देश का महफूज है , जिनकी निगाह में !
धनतेरस का पहला दिया , जले उनकी राह में !
नर्स , चिकित्सक , स्वा. कर्मी को शत शत प्रणाम !
दूजा दिया समर्पित मैं करूं , कोरोना वीरों के नाम !
सफाई कर्मी घर - घर जाकर , कचरा उठाते हैं !
एक दिये से उनके आंगन में , उजियारा फैलाते हैं !
सुरक्षा , सहयोग के साथ ,सेवा का जो काम किये !
चलो करते हैं , पुलिस वालों के नाम एक दिये !
गटर में घुस कर , साफ करे जो हमारी गंदगी को !
एक दिये से प्रकाशित करें , उनकी जिंदगी को !
एक दिया उन , माता - पिता के चरणों में !
जीवन व्यतीत कर रहे हैं , जो वृद्धाश्रमों में !
एसिड अटैक का , शिकार हुई जो बाला !
एक दिये से उनके , जीवन में आए उजाला !
उनकी व्यथा कैसे बयां करूं , जिनकी अस्मत लूटी !
एक दिया कुर्बान उनको , जिनसे खुशियां रूठी !
वो यतीम बच्चें जिनका , कोई नहीं इस जहां में !
दूर हो तमस सारा , ऐसा दिया जले उनके मकां में !
चाहे जिन मजबूरियों से , वो तवायफ बनी !
धनतेरस के एक दिये से , उनके घर भी हो रोशनी !
शहरों की चकाचौंध में , जो सोते हैं फूटपाथ पर !
उजास का एक दिया , बेकसी वाली हयात पर !
मेहनत और श्रम का , जो देते हैं पैगाम !
एक दिया अर्पण करों , उन मजदूरों के नाम !
जिनके पसीने की खुशबू से , हम अन्न खाते हैं !
अंतिम दिया हम उन किसानों के नाम जलाते हैं !
जीवन में जुदा - जुदा है , सबके कर्मों का रंग !
आओ मनाएं धनतेरस , इन कर्मवीरों के संग !
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